Poster-style graphic on the baluta system and Mahar watan: respect or servitude, with sources | वतनदार महार और बलुता पद्धति पर नेवी-ब्लू पोस्टर स्टाइल ग्राफिक: सम्मान या गुलामी, सोर्स के साथ
सम्मान और गुलामी एक ही गाँव में साथ-साथ रह सकते हैं, और वतनदार महार की कहानी यही दिखाती है 👇
बलुता पद्धति में महारों को अनाज, हक़ और ज़मीन मिलती थी, और वतन उन्हें एक सरकारी-सा पद देता था। “ये सम्मान का काम था” वाली बात गढ़ी हुई नहीं है। फिर भी वो पद सँभालने वाले महार को ऊँची जाति के आदमी के लिए सड़क से हटना पड़ता था (Mandloi, Vidyasagar University Journal of History, 2019–20, p. 106)। चल, दोनों हिस्से जाँचते हैं।
वतन का मतलब था वंशानुगत ज़मीन का अनुदान और उसके साथ मिला पद (Mandloi, p. 104)। महारों के लिए वतन दोनों था: वंशानुगत पद भी और ज़मीन भी (Mandloi, p. 104)।
बलुता पद्धति अंग्रेज़ों से पुरानी है। महाराष्ट्र के गाँवों में ये मध्य-काल से चली आ रही थी और अंग्रेज़ी राज में भी चलती रही (Mandloi, p. 104)। गाँव के सेवकों को तीन चीज़ें मिलती थीं: सालाना अनाज का हिस्सा (बलुते), तरह-तरह के हक़ (haqs) और बिना लगान की inam ज़मीन। ये सब मिलाकर बलुतेदारों का वतन कहलाता था (Mandloi, p. 105)। महार गाँव के बारह बलुतेदारों (बारा बलुतेदार) में गिने जाते थे (Mandloi, p. 105)। इस समुदाय के बारे में और जानना हो तो हमारा महार जाति इतिहास पढ़।
क्या वतनदार महार का पद सम्मान का काम था?
पहले सामने वाले का सबसे मज़बूत तर्क सुन। उन्नीसवीं सदी के मध्य की एक ब्रिटिश रिपोर्ट ने महार को “गाँव की आँख” कहा, और लिखा कि दो किसानों के बीच सीमा का झगड़ा उसकी गवाही से निपट सकता है (R. N. Goodine, via Mandloi, p. 106)। एक और औपनिवेशिक लेखक के मुताबिक महार ज़िला खज़ाने तक बड़ी रकम पहुँचाने का काम गर्व से करते थे (A. Robertson, via Mandloi, p. 106)।
व्यवस्था ने महारों को गाँव के सेवकों की पहली पंक्ति में रखा, क्योंकि उनकी सेवा बहुत ज़रूरी मानी जाती थी (Mandloi, p. 105)। 1874 के Bombay Hereditary Offices Act ने भी वतनदार महारों को वंशानुगत गाँव अधिकारियों में गिना (Mandloi, p. 110)। जापानी विद्वान Fukazawa का तर्क है कि सेवक जातियाँ किसी एक मालिक की नहीं, पूरे गाँव की सेवक थीं (via Mandloi, p. 105)। तो पद में असली हैसियत थी, इसीलिए दावा वज़नदार लगता है।
वतनदार महार: सम्मान वाले दावे की पोल
पहला, सेवा अनिवार्य और वंशानुगत थी। पाटील और कुलकर्णी समेत पूरे गाँव का महार की मेहनत पर हक़ था (Mandloi, p. 105)। महार बिना हुनर वाले, सबसे नीचे के काम करते थे, और मरे पशुओं को हटाना सबसे अशुद्ध माना जाता था (Mandloi, pp. 105–106)। उसी काम की वजह से महार अछूत गिने गए (A. Robertson, via Mandloi, p. 106)।
दूसरा, घंटों की कोई हद नहीं थी। 1928 में आंबेडकर ने Bombay Legislative Council में कहा कि कर्तव्य परिभाषित नहीं थे और घंटे तय नहीं थे। ड्यूटी वाला महार न हो, तो परिवार का कोई सदस्य, औरतें भी, सेवा के लिए मजबूर किए जा सकते थे (Ambedkar, BAWS Vol 2, via Mandloi, p. 111)। उन्हें दिन-रात किसी भी वक़्त बुलाया जा सकता था (Ambedkar, BAWS Vol 2, via Mandloi, p. 111)।
तीसरा, पगार कम और अनिश्चित थी। आंबेडकर ने Council को बताया कि सरकार महारों को सीधे लगभग कुछ नहीं देती: ठाणे में Rs 1-8-0 महीना और नासिक में Rs 0-13-4 (Ambedkar, BAWS Vol 2, via Mandloi, p. 112)। बाकी बलुता किसानों से आता था, और 1835 के एक पर्यवेक्षक ने लिखा कि किसान क्या देगा, ये शायद ही पहले से पता होता था (W. H. Sykes, via Mandloi, p. 107)। वतन की ज़मीन भी छोटी थी और वारिसों में बँटते-बँटते बहुत कम रह जाती थी (M. G. Bhagat, via Mandloi, p. 107)।
चौथा, ताक़त किसानों के हाथ में थी। आंबेडकर के मुताबिक जब किसी गाँव के महार आगे बढ़ने की कोशिश करते, तो किसान बलुता रोक देते और सामाजिक बहिष्कार का ऐलान कर देते (Ambedkar, BAWS Vol 2, via Mandloi, p. 112)। और सम्मान से छुआछूत नहीं मिटती थी। महार को अपनी परछाई किसी ऊँची जाति वाले पर पड़ने से बचाने के लिए किनारे हटना पड़ता था, और काला धागा बाँधना पड़ता था (Mandloi, p. 106)। 1884 के Sholapur Gazetteer ने महारों को गरीबी से टूटा, निचले दर्जे का और “नफ़रत और डर” वाला वर्ग बताया (Gazetteer, via Mandloi, p. 107)।
पाँचवाँ, ये व्यवस्था इंसान को बाँधकर रखती थी। आंबेडकर के लिए जाति सिर्फ़ श्रम का बँटवारा नहीं थी, श्रमिकों का बँटवारा थी, जिसमें श्रमिक एक-दूसरे के ऊपर-नीचे दर्जे में रखे जाते हैं (BAWS Vol 1, Annihilation of Caste, via Mandloi, p. 108)। 1939 में उन्होंने महार वतन को “बेरहम शोषण की व्यवस्था” कहा (मूल अंग्रेज़ी: “a system of heartless exploitation”) (Janata, 1939, via Mandloi, p. 115)।
आंबेडकर का वतन बिल क्या बदलना चाहता था?
बलुता पद्धति की ये लड़ाई कानून में कैसे चली, देख। नीचे की तारीख़ें Mandloi के पेपर से ली गई हैं।
तारीख़
घटना
स्रोत
1874
Bombay Hereditary Offices Act “वंशानुगत पद” परिभाषित करता है, महार इसमें आते हैं
Mandloi, p. 110
19 मार्च 1928
आंबेडकर Bombay Legislative Council में Bill No. XII of 1928 पेश करते हैं
Mandloi, p. 110; BAWS Vol 2, p. 72
3 अगस्त 1928
बिल पर उनका भाषण
Mandloi, pp. 110–114; BAWS Vol 2, pp. 75–89
24 जुलाई 1929
आंबेडकर बिल वापस लेते हैं
Mandloi, p. 114
17 सितंबर 1937
1874 के कानून में बदलाव का दूसरा बिल
Mandloi, p. 114
1941
आंबेडकर गवर्नर को बताते हैं कि नई नीति से पगार घटी और कर्तव्य बढ़े
Mandloi, p. 114
1959
Bombay Inferior Village Watans Abolition Act
Act 1 of 1959
1928 के बिल के पाँच मक़सद थे: वतनदारों को बेहतर पगार, वतन की commutation का रास्ता, बलुता को पैसे के उपकर में बदलना, किसानों की सेवा के फ़र्ज़ से आज़ादी, और कर्तव्यों की साफ़ परिभाषा (Mandloi, p. 111)। आंबेडकर चाहते थे कि चुनने की आज़ादी हो: जो महार सेवा छोड़ना चाहें, वो ज़मीन रखकर पूरा राजस्व दें, और जो रुकें, उन्हें सही पगार मिले (Mandloi, p. 112)।
महार वतन खत्म कैसे हुआ?
ये काम Bombay Inferior Village Watans Abolition Act (Act 1 of 1959) ने किया। धारा 4 ने सारे inferior village watans खत्म किए और उनसे जुड़े सारे हक़, यहाँ तक कि सेवा करने की बाध्यता भी, समाप्त कर दी (Bombay Inferior Village Watans Abolition Act, 1958, s. 4)। वतन की ज़मीन वापस ली गई, फिर वतनदार को पूरे assessment के तीन गुना occupancy price पर दोबारा दी गई (Act, s. 5)। वतनदार को मुआवज़ा भी मिला (Act, s. 10)।
Mandloi के मुताबिक दादासाहेब गायकवाड़ का भूमिहीन सत्याग्रह (1958–59) ज़मीन के हक़ की माँग को आगे ले गया (Mandloi, p. 117)। और आज बेगार जैसी जबरन मज़दूरी संविधान से भी मना है (Constitution of India, Article 23)।
“सम्मान वाला काम” का मिथ बार-बार क्यों लौटता है
ये मिथ असली शब्द उधार लेता है। “पद”, “inam ज़मीन” और “गाँव की आँख” सुनने में इज़्ज़तदार लगते हैं, और ये रिकॉर्ड में सचमुच हैं (Mandloi, pp. 104–106)। फिर ये घंटे, पगार और बहिष्कार छोड़ देता है (Mandloi, pp. 111–112)।
ये एक सवाल से भी बचाता है: फ़ायदा किसे था? आंबेडकर की नज़र में बलुता पद्धति महारों को गाँव और किसानों से बाँधकर रखती थी (Mandloi, p. 107)। (ऐसे रिकॉर्ड तब तक दबे रहते हैं जब तक कोई उन्हें सीधी भाषा में लिखकर सामने न रखे। इसी के लिए Ambedkarite Educational Program अंबेडकराइट्स को तैयार करता है: Blogging & SEO, Website Building और Google AI।)
निचोड़
बलुता पद्धति के साथ असली हैसियत जुड़ी थी, और साथ में घंटों की कोई हद नहीं थी, कम पगार थी और बहिष्कार का डर था (Mandloi, pp. 105–112)। आंबेडकर ने 1928 में वतन खत्म करने की कोशिश की और बिल पास नहीं करवा पाए, पर 1959 के Act ने ये काम पूरा किया (Mandloi, p. 114; Act, s. 4)। सच बोलूं तो जिस सम्मान को आप ठुकरा नहीं सकते, वो सम्मान नहीं होता।
बाबासाहेब ने तीन शब्द दिए: Educate. Agitate. Organize.
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बलुता पद्धति क्या थी? गाँव के सेवकों को सालाना अनाज का हिस्सा, हक़ और inam ज़मीन मिलने की व्यवस्था। ये मध्य-काल से चली और अंग्रेज़ी राज में भी जारी रही (Mandloi, pp. 104–105)।
महार वतन क्या था? महार गाँव-सेवकों को मिला वंशानुगत पद और ज़मीन का अनुदान (Mandloi, p. 104)।
क्या आंबेडकर ने महार वतन खत्म करने की कोशिश की? हाँ। उन्होंने 19 मार्च 1928 को Bill No. XII of 1928 पेश किया और 24 जुलाई 1929 को वापस लिया (Mandloi, pp. 110, 114)। 1937 में दूसरा बिल भी लाए (Mandloi, p. 114)।
महार वतन खत्म कैसे हुआ? Bombay Inferior Village Watans Abolition Act (Act 1 of 1959) की धारा 4 ने inferior village watans खत्म किए (Act 1 of 1959, s. 4)।
क्या भारत में जबरन मज़दूरी गैरकानूनी है? हाँ। संविधान का अनुच्छेद 23 बेगार और ऐसी जबरन मज़दूरी को मना करता है (Constitution of India, Article 23)।
आगे पढ़ने के लिए (Mandloi में उद्धृत, इस लेख के लिए पढ़े नहीं): H. Kotani, “Conflict and Controversy over the Mahar Vatan” (Manohar, 1997); Gail Omvedt, Dalits and the Democratic Revolution (Sage, 1994)
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