मनुस्मृति दहन दिवस: बाबासाहेब ने 1927 में इसे क्यों जलाया?

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Poster-style graphic for Manusmriti Dahan Din: Mahad, 25 December 1927, and why it was a protest | मनुस्मृति दहन दिवस पर नेवी-ब्लू पोस्टर स्टाइल ग्राफिक: महाड़, 25 दिसंबर 1927, एक विरोध, साज़िश नहीं

मनुस्मृति दहन दिवस: बाबासाहेब ने 1927 में इसे क्यों जलाया?

हर साल 25 दिसंबर को मनुस्मृति दहन दिवस लौटता है, और साथ में एक दावा भी: कि ये जलाना औपनिवेशिक साज़िश थी। चल, रिकॉर्ड से जाँचते हैं 👇

मनुस्मृति दहन दिवस (Latin में “manusmriti dahan din”) 1927 की उस घटना की याद है जब महाड़ के एक सम्मेलन में मनुस्मृति की एक प्रति जलाई गई थी (SabrangIndia, 2017, M. S. Gore के हवाले से)। ये पोस्ट घटना, कारण और दावे की जाँच करती है। ये एक कानूनी ग्रंथ और उसके इस्तेमाल की आलोचना है, किसी समुदाय पर हमला नहीं।

मनुस्मृति दहन दिवस: महाड़ में क्या हुआ

महाड़ सत्याग्रह की शुरुआत इस हक़ के लिए हुई कि दलित चवदार तालाब से पानी पी सकें, जो एक सार्वजनिक जल-स्रोत था (SabrangIndia, 2017)। बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल ने 1923 में सार्वजनिक पानी के इस्तेमाल की इजाज़त वाला प्रस्ताव पास किया था (Civilsdaily)। बाबासाहेब और उनके साथियों ने मार्च 1927 में इसे परखने के लिए तालाब से पानी पिया (Civilsdaily)।

फिर सवर्ण हिंदुओं ने स्थानीय अदालत से स्टे ऑर्डर ले लिया (SabrangIndia, 2017)। 14 दिसंबर 1927 की महाड़ दीवानी अदालत की निषेधाज्ञा (injunction) ने तालाब तक दलितों की पहुँच रोक दी (Anantam IAS)। एक स्थानीय मुस्लिम ज़मींदार फ़त्तेखान ने सम्मेलन के लिए अपनी निजी ज़मीन दी (SabrangIndia, 2017)।

25 दिसंबर 1927 की शाम सम्मेलन में मनुस्मृति जलाने का प्रस्ताव पास हुआ। प्रस्ताव गंगाधर नीलकंठ सहस्रबुद्धे ने रखा, जो बाबासाहेब के ब्राह्मण साथी थे, और दलित नेता पी. एन. राजभोज ने उसका समर्थन किया (SabrangIndia, 2017)। फिर सहस्रबुद्धे और पाँच-छह दलित साधुओं ने पंडाल के सामने बनी चिता पर मनुस्मृति जलाई (SabrangIndia, 2017)। बैनरों पर लिखा था “Crematorium for Manusmruti”, “Destroy Untouchability” और “Bury Brahmanism” (SabrangIndia, 2017)।

बाबासाहेब ने मनुस्मृति क्यों जलाई

अपने अध्यक्षीय भाषण में बाबासाहेब ने कहा कि मक़सद सिर्फ़ पानी या मंदिर-प्रवेश नहीं है। मक़सद उस वर्ण-व्यवस्था को तोड़ना है जो असमानता को टिकाए रखती है (SabrangIndia, 2017)। उन्होंने ऊँचे वर्णों से अपील की कि वो इस “social revolution” को शांति से होने दें (SabrangIndia, 2017)।

बाद में उन्होंने 3 फरवरी 1928 के बहिष्कृत भारत में अपनी बात समझाई। उन्होंने लिखा कि मनुस्मृति पढ़कर उन्हें यक़ीन हो गया कि वो समानता का दूर-दूर तक समर्थन नहीं करती (SabrangIndia, 2017)। उन्होंने कहा कि किसी चीज़ को जलाना उस विचार के ख़िलाफ़ विरोध दर्ज करना है जिसका वो प्रतीक है (SabrangIndia, 2017)। और उन्होंने इसकी तुलना गांधी की विदेशी कपड़े जलाने की सलाह से की (SabrangIndia, 2017)।

“औपनिवेशिक साज़िश” वाला दावा, सबसे मज़बूत रूप में

इस दावे का एक असली आधार है। अंग्रेज़ों ने मनुस्मृति को कानून में नया वज़न दिया। 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने कंपनी की अदालतों के लिए हिंदू कानून का संकलन बनाने को ग्यारह पंडित रखे (Hinduism Today, 2001)। फिर सर विलियम जोन्स ने 1794 में मनुस्मृति का अनुवाद Institutes of Hindu Law, or the Ordinances of Manu नाम से किया (Indian Culture portal)।

कोलब्रुक की देखरेख में 1800 में जारी हिंदू कानून का digest भी मनु के विधानों पर आधारित था (Encyclopaedia Britannica, 8th ed., 1860)। Hinduism Today का 2001 का एक लेख उस तर्क का सार देता है कि मनुस्मृति का अटल दर्जा अंग्रेज़ों ने थोपा (Hinduism Today, 2001)। यहीं से कुछ लोग कहते हैं कि 1927 का दहन भी औपनिवेशिक स्क्रिप्ट थी।

मनुस्मृति दहन औपनिवेशिक साज़िश: दावा कहाँ टूटता है

पहला, ग्रंथ और जाति दोनों अंग्रेज़ों से पुराने हैं। जोन्स ने 1794 में एक पहले से मौजूद ग्रंथ का अनुवाद किया (Indian Culture portal)। बाबासाहेब ने 1916 में लिखा कि जाति मनु से बहुत पहले की है, और मनु ने मौजूद नियमों को संहिता में लिखा (BAWS Vol 1, p. 16)। अल्बरूनी ने लगभग 1030 में जाति दर्ज की (BAWS Vol 5, ch. 16, p. 147)। इस पर हमारी पोस्ट जाति व्यवस्था का इतिहास: क्या अंग्रेजों ने जाति बनाई? और अंबेडकर कास्ट्स इन इंडिया पढ़।

दूसरा, औपनिवेशिक राज्य रास्ते में खड़ा था। एक अदालती निषेधाज्ञा ने तालाब पर सत्याग्रह को रोक दिया (Anantam IAS)। बाबासाहेब ने लिखा कि अछूत सवर्ण हिंदुओं और सरकार के बीच फँसे हैं (SabrangIndia, 2017)।

तीसरा, जलाने के पीछे दलित नेता और एक ब्राह्मण साथी थे, औपनिवेशिक अफ़सर नहीं (SabrangIndia, 2017)। एक अख़बार ने इस पर बाबासाहेब को “भीमासुर” तक कहा (SabrangIndia, 2017)। ये घरेलू विरोध है, औपनिवेशिक तालियाँ नहीं।

चौथा, उनके बताए कारण उनकी अपनी पढ़ाई थी, और विरोध का वो तरीका जो भारतीय राष्ट्रवादी भी इस्तेमाल करते थे (SabrangIndia, 2017)। तो अंग्रेज़ों ने मनुस्मृति का अनुवाद किया, उसका digest बनवाया और कानून में उसे ऊँचा दर्जा दिया। महाड़ का दहन उन्होंने नहीं लिखा।

“मनुस्मृति दहन औपनिवेशिक साज़िश” वाला दावा बार-बार क्यों लौटता है

ये एक सच से शुरू होकर उसे खींचता है। ब्रिटिश अदालतों ने मनु का इस्तेमाल किया, और “अंग्रेज़ों ने इसे अहमियत दी” फिसलकर “अंग्रेज़ों ने इसे गढ़ा” बन जाता है (Hinduism Today, 2001)। इससे लोगों को ग्रंथ की सामग्री से बचने का रास्ता मिलता है, क्योंकि सवाल “इसमें लिखा क्या है” की जगह “इसे छापा किसने” बन जाता है।

प्राथमिक स्रोत पढ़ना वही आदत है जो Ambedkarite Educational Program सिखाता है: Blogging & SEO, Website Building और Google AI। 1953 की आधी लाइन वाले एक और दावे के लिए हमारी पोस्ट अंबेडकर संविधान जलाना देख। सनातन धर्म वाली बड़ी बहस के लिए सनातन धर्म उन्मूलन और अंबेडकर पढ़।

निचोड़

मनुस्मृति दहन दिवस 25 दिसंबर 1927 को महाड़ में हुए विरोध की याद है, जो पानी की लड़ाई से शुरू हुआ था (SabrangIndia, 2017)। अंग्रेज़ों ने ग्रंथ को कानूनी वज़न दिया, और दावे का ये हिस्सा सच है (Indian Culture portal; Encyclopaedia Britannica, 1860)। उन्होंने ग्रंथ, जाति या दहन नहीं रचा (BAWS Vol 1, p. 16; SabrangIndia, 2017)।

बाबासाहेब ने तीन शब्द दिए: Educate. Agitate. Organize.

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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मनुस्मृति दहन दिवस क्या है?
ये 25 दिसंबर को मनाया जाता है और 1927 में महाड़ सम्मेलन में मनुस्मृति की एक प्रति जलाने की याद है (SabrangIndia, 2017)।

महाड़ में मनुस्मृति किसने जलाई?
गंगाधर नीलकंठ सहस्रबुद्धे ने, जो बाबासाहेब के ब्राह्मण साथी थे, प्रस्ताव रखा और पाँच-छह दलित साधुओं के साथ उसे जलाया। पी. एन. राजभोज ने प्रस्ताव का समर्थन किया (SabrangIndia, 2017)।

बाबासाहेब ने मनुस्मृति क्यों जलाई?
उन्होंने कहा कि पढ़ने पर उन्हें लगा कि ग्रंथ समानता का समर्थन नहीं करता, और जलाना उस विचार के ख़िलाफ़ विरोध दर्ज करना है (SabrangIndia, 2017)।

क्या मनुस्मृति दहन औपनिवेशिक साज़िश थी?
नहीं। अंग्रेज़ों ने ग्रंथ को कानूनी वज़न दिया, पर वो उनसे पहले से मौजूद था, और एक औपनिवेशिक अदालती निषेधाज्ञा ने महाड़ सत्याग्रह रोका (Indian Culture portal; Anantam IAS)।

मनुस्मृति का दहन कहाँ हुआ?
महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र में महाड़ में, चवदार तालाब सत्याग्रह के बाद हुए सम्मेलन में (SabrangIndia, 2017)।

स्रोत

  1. SabrangIndia, “Why did Dr Babasaheb Ambedkar publicly burn the Manu Smruti on Dec. 25, 1927?”, 24 December 2017 (M. S. Gore, The Social Context of an Ideology, Sage के हवाले से): https://sabrangindia.in/why-did-dr-babasaheb-ambedkar-publicly-burn-manu-smruti-dec-25-1927/
  2. Civilsdaily, “How the Mahad satyagraha(s) shaped constitutional discourse”: https://www.civilsdaily.com/news/how-the-mahad-satyagrahas-shaped-constitutional-discourse/
  3. Anantam IAS, “Ambedkar’s Mahad Satyagraha, a ‘watershed moment of Dalit assertion’”: https://anantamias.com/current-affairs/ambedkars-mahad-satyagraha-a-watershed-moment-of-dalit-assertion/
  4. Hinduism Today, “Manu and the Brits,” January–February 2001: https://www.hinduismtoday.com/magazine/january-february-2001/2001-01-manu-and-the-brits/
  5. Indian Culture portal (Ministry of Culture), rare book record: William Jones, Institutes of Hindu Law, or the Ordinances of Manu (Calcutta, 1794): https://www.indianculture.gov.in/rarebooks/institutes-hindu-law-or-ordinances-menu-according-gloss-culluca-comprising-indian-system
  6. Encyclopaedia Britannica, 8th edition (1860), “Jones, Sir William” (mirror copy): https://jimclifford.ca/early_encyclopedia_britannica/articles/1860/eb_8th_1860_009656.html
  7. B. R. Ambedkar, “Castes in India,” BAWS Vol 1, p. 16: https://www.marxists.org/archive/ambedkar/writings-and-speeches/Volume_01.pdf
  8. B. R. Ambedkar, BAWS Vol 5, ch. 16, p. 147 (अल्बरूनी): https://surajyengde.com/wp-content/uploads/2023/07/THE-HOUSE-THE-HINDUS-HAVE-BUILT.pdf

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