नाम था शिवराम जानबा कांबळे। बाबासाहेब की पढ़ाई पूरी होने से पहले इस आदमी का अपना printing press चल रहा था। और 1927 में Ambedkar को कोरेगांव के खंभे तक बुलाने वाला यही आदमी था (Indian History Collective, Kumbhojkar के हवाले से)।
हर 1 जनवरी को लाखों लोग भीमा कोरेगांव पहुँचते हैं। पर ये परंपरा शुरू किसने की, ये लगभग किसी को नहीं पता। 🪔
फिर इतिहास ने इन्हें भुला दिया। चल, ठीक करते हैं।
कौन थे शिवराम जानबा कांबळे?
जन्म 1875, पुणे। महार समाज से (mr.wikipedia / MPSCExams)। पिता जानबा कांबळे भांबुर्डे गाँव के वतनदार महार थे — यानी जाति से जुड़ा गाँव का काम उनके नाम लिखा था (mr.wikipedia)।
पर जानबा ने वो काम छोड़ दिया। पुणे में यूरोपियन लोगों के यहाँ नौकरी की, और बेटे को पढ़ने दिया (mr.wikipedia)।
देख, यही एक फैसला सब बदल गया। शिवराम ने मराठी और English दोनों सीखीं (MPSCExams)। पुणे के लष्कर इलाके में भीमपुरा 1373/6 उनका घर था, और वहीं से पूरा आंदोलन चलता था (mr.wikipedia)।
Academic source उनके साल 1875–1942 बताता है (Anupama Rao, The Caste Question, UC Press)। मराठी sources 1940 कहते हैं (MPSCExams)। मराठी Wikipedia पर मृत्यु का साल खाली है। सच बोलूं — यही gap बताता है कि documentation कितनी कमज़ोर है।
मूकनायक से पहले सोमवंशीय मित्र था
1904 में उन्होंने पुणे में श्री शंकर प्रसादिक सोमवंशीय हितचिंतक मित्र समाज बनाया, साथ में एक वाचनालय भी खोला (Literary Herm journal)। मराठी sources इसे भारत की पहली दलित संगठित संस्था कहते हैं (mr.wikipedia)।
फिर असली काम। 1908 से 1910 तक उन्होंने सोमवंशीय मित्र नाम की मासिक पत्रिका निकाली (mr.wikipedia; महाराष्ट्र बोर्ड कक्षा 8 इतिहास, पाठ 11)। लिखते खुद, छापते खुद, बाँटते खुद।
इसीलिए उन्हें आंबेडकर-पूर्व काल का पहला दलित पत्रकार, मुद्रक, प्रकाशक और संपादक कहा जाता है (mr.wikipedia)। मूकनायक 1920 में आया। कांबळे बारह साल आगे थे।

पहले ही अंक की एक लाइन आज भी चुभती है। उन्होंने पूछा — जो आदमी महार का स्पर्श नहीं मानता, उसकी परछाईं तक त्याज्य मानता है, वही आदमी उसके ईसाई बनते ही छूने लायक मान लेता है, ऐसा क्यों? (mr.wikipedia)
ये शिकायत नहीं थी। ये जाल था, और उन्होंने छापकर बिछाया।
51 गाँव, एक अर्ज़ी, ज़ीरो डर
1903 में कांबळे ने पुणे के पास सासवड में 51 गाँवों के महारों की सभा बुलाई (Columbia University, Ambedkar timeline)। सभा से एक अर्ज़ी निकली, जो बॉम्बे के गवर्नर को भेजी गई। माँगें चार — सरकारी नौकरी, सरकारी स्कूल में दाखिला, पुलिस में भर्ती, और फौज में भर्ती (Columbia University)। columbiacolumbia
1903 में, लिखित में। सोच ज़रा।
वो रुके नहीं। Academic record में 1905 और 1910 की अर्ज़ियाँ दर्ज हैं, दोनों में महारों की फौज में वापसी की माँग (Anupama Rao, UC Press)। 1910 में जेजुरी में दूसरी महार परिषद हुई, जिसका ज्ञापन ब्रिटिश सरकार को भेजा गया (Columbia University)। Mahar Regiment का अपना record 1904 की अर्ज़ी का ज़िक्र करता है (en.wikipedia)। columbia
फौज ही क्यों? क्योंकि अंग्रेज़ों ने “martial race theory” के नाम पर महारों की भर्ती बंद कर दी थी, और गाँव की जाति-व्यवस्था से निकलने का एक रास्ता कट गया था (The Wire, 2018)। कांबळे का जवाब सीधा था — मौका दो, महार पीछे नहीं रहेगा (mr.wikipedia)।
नतीजा? जून 1917 में 111th Mahars बटालियन बनी (en.wikipedia)। 1921 में भंग (The Wire, 2018)। आख़िरकार 1941 में Mahar Regiment खड़ी हुई (en.wikipedia)। यानी लड़ाई चालीस साल चली। शुरुआत कांबळे ने की।
देवदासी वाली लड़ाई जो कोई नहीं पढ़ाता
ये हिस्सा सबसे ज़्यादा मिटाया गया।
सोमवंशीय मित्र के ज़रिए कांबळे ने मुरळी, जोगतिन और देवदासी प्रथा के खिलाफ लगातार अभियान चलाया (महाराष्ट्र बोर्ड कक्षा 8 इतिहास)। लेख लिखे। सभाएँ कीं। साथ ही परिवारों से सीधी अपील की कि जेजुरी में खंडोबा और यल्लम्मा को बेटियाँ चढ़ाना बंद करें (Shaalaa, महाराष्ट्र बोर्ड notes)।
फिर वो moment आया। शिबूबाई नाम की एक देवदासी ने लंबा खत लिखा, अपनी ज़िंदगी बताई, और कहा कि जो शादी करने को तैयार हो उससे कर लेगी (Shaalaa)। कांबळे ने वो खत छाप दिया। उनके साथी गणपतराव हनुमंतराव गायकवाड़ तैयार हुए, शादी हुई, और कांबळे ने जान-बूझकर उसका खूब प्रचार किया (Shaalaa)।
नतीजा — 1909 में एक भी लड़की खंडोबा को देवदासी के रूप में नहीं चढ़ाई गई (Shaalaa)।
एक आदमी, एक पत्रिका, एक साल। यही होता है जब प्रेस दलित के हाथ में हो। 2026 में हम वही लड़ाई किराये के platforms पर लड़ रहे हैं जो कभी भी ban कर सकते हैं — इसीलिए Ambedkarite Educational Program में reach के पीछे भागना नहीं, blogging, website और email list बनाना सिखाया जाता है।
इतिहासकार एक और बात कहते हैं। कांबळे ने शादी और monogamy को हल बताया, जिससे ताक़त पंच और घर के मर्दों से हटकर उन जैसे दलित प्रचारकों के पास आ गई (Anupama Rao, UC Press)। असली इतिहास के किनारे तीखे होते हैं। हम उन्हें घिसेंगे नहीं।
अलग स्कूल — उनका सबसे uncomfortable argument
कांबळे दलित बच्चों के लिए अलग स्कूलों के पक्ष में थे। तर्क सीधा था — ब्राह्मण मास्टर जाति को क्लासरूम के अंदर ले आते हैं, तो मिले-जुले स्कूल सिर्फ़ अपमान की जगह बदलेंगे (Anupama Rao, UC Press)।
बीसवीं सदी के पहले दो दशकों में बॉम्बे, पूना और अहमदनगर में दलित छात्रों के लिए अलग स्कूल और hostel खुले (Anupama Rao)। एक आँकड़ा देख — 1894 में शाहू महाराज के गद्दी संभालने के वक़्त सिर्फ़ 234 दलित बच्चे प्राथमिक शिक्षा में थे। 1921–22 तक ये संख्या 27,830 हो गई (Literary Herm journal)।
मक़सद अलगाव नहीं था। मक़सद पहुँच था।
भीमा कोरेगांव 1927 — बुलावा उन्होंने भेजा था
अब वो receipt जो हर भीमा कोरेगांव पोस्ट पर होनी चाहिए 👇
कांबळे ने 1900 के पहले दशक में कोरेगांव के खंभे पर लगातार महार सभाएँ कीं, लोगों को याद दिलाया कि 1818 में उनके पुरखे यहाँ लड़े थे (The Wire, 2020)। वालंगकर और कांबळे जैसे शुरुआती नेताओं के लिए ये स्मारक महार शौर्य का सबूत था (Indian History Collective)।
और फिर — 1 जनवरी 1927 को, युद्ध की सालगिरह पर, कांबळे ने ही डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर को सभा संबोधित करने बुलाया (Indian History Collective, Kumbhojkar)। बाबासाहेब की वो पहली विज़िट थी (The Mooknayak)। उसके बाद वो हर साल आए और लोगों से वही हिम्मत दिखाने को कहा (The Mooknayak)। themooknayakthemooknayak
उस दिन की मशहूर फोटो में बाबासाहेब बीच में हैं। शिवराम जानबा कांबळे उनके बाईं तरफ खड़े हैं, गले में हार पहने (The Wire, 2018)।
उसी साल महाड हुआ। 1927 इत्तेफ़ाक नहीं था।

पर्वती सत्याग्रह 1929
1929 तक पुणे के दलित पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा organised थे (The News Minute)। और पर्वती सत्याग्रह 1929 असली टेस्ट था।
पर्वती मंदिर पहाड़ी पर था, पेशवाओं का बनवाया, सदियों से दलितों के लिए बंद (Vajiram & Ravi)। 13 अक्टूबर 1929 को सत्याग्रह शुरू हुआ — पी.एन. राजभोज, शिवराम कांबळे, कदम वगैरह की अगुवाई में (IJSRST paper)। सैकड़ों लोग पहाड़ी के नीचे जमा हुए। गैर-ब्राह्मण नेता और कुछ उदार ब्राह्मण भी जुड़े (The News Minute)।
फिर 12 सत्याग्रही, जिनमें 4 महिलाएँ थीं, सीढ़ियाँ चढ़ने लगे। ऊँची जाति के लोगों ने हमला किया। राजभोज समेत कई घायल हुए, अस्पताल ले जाना पड़ा (The News Minute)। पुलिस और कलेक्टर आए और मंदिर बंद करा दिया (The News Minute)।
मंदिर कमेटी का बहाना — मंदिर निजी संपत्ति है (IJSRST)। सत्याग्रह 20 अक्टूबर 1930 को स्थगित हुआ (IJSRST)।
अंदर नहीं घुस पाए। पर ये साफ़ हो गया कि कौन खड़ा होता है और पहला हाथ कौन उठाता है।
शिवराम जानबा कांबळे माहिती जो textbook ने छुपाई
अब सवाल ये — इतना बड़ा आदमी गायब कैसे है?
पहला, English Wikipedia पर उनका कोई पेज ही नहीं है। stub तक नहीं। मराठी पेज है पर कुछ सौ शब्दों का, और मृत्यु का साल तक दर्ज नहीं (mr.wikipedia)। आज online जो भी शिवराम जानबा कांबळे माहिती मिलती है, वो या तो MPSC के cram notes हैं या 2012 का एक बिना-source हिंदी ब्लॉग।
दूसरा, गंभीर काम बंद पड़ा है। 194 पन्नों की पूरी मराठी जीवनी मौजूद है — शिवराम जानबा कांबळे यांचे चरित्र आणि पुणे पर्वती सत्याग्रहाचा संक्षिप्त इतिहास, ह.ना. नवलकर, सुगावा प्रकाशन, 1997 (CiNii record)। महाराष्ट्र के बाहर शायद ही किसी ने पढ़ी हो।
तीसरा, फ़ायदा किसका? आंबेडकर-पूर्व दलित प्रेस दो कहानियाँ एक साथ तोड़ता है। एक, कि दलित चेतना 1920 के बाद शुरू हुई। दो, कि जाति-सुधार ऊपर से तोहफ़े में मिला। कांबळे न इंतज़ार कर रहे थे, न बचाए जा रहे थे। वो छाप रहे थे।
पूरी timeline
| साल | घटना | Source |
|---|---|---|
| 1875 | पुणे में जन्म | mr.wikipedia |
| 1903 | सासवड में 51 गाँवों की सभा, गवर्नर को अर्ज़ी | Columbia University |
| 1904 | सोमवंशीय हितचिंतक मित्र समाज + वाचनालय | Literary Herm |
| 1905 | महार फौजी भर्ती की अर्ज़ी | Anupama Rao, UC Press |
| 1908–10 | सोमवंशीय मित्र पत्रिका | mr.wikipedia |
| 1909 | खंडोबा को एक भी देवदासी नहीं चढ़ाई गई | महाराष्ट्र बोर्ड |
| 1910 | जेजुरी परिषद, ब्रिटिश सरकार को ज्ञापन | Columbia University |
| 1917 | 111th Mahars बटालियन | en.wikipedia |
| 1 जन 1927 | आंबेडकर को भीमा कोरेगांव बुलाया | Indian History Collective |
| 13 अक्टू 1929 | पर्वती सत्याग्रह, पुणे | The News Minute / IJSRST |
| 1940 या 1942 | मृत्यु — sources अलग-अलग | MPSCExams vs UC Press |
2026 के Ambedkarites के लिए सबक
कांबळे के पास न platform था, न funding, न reach। तो उन्होंने 1904 में प्रेस और वाचनालय बना लिया, और पाँच साल में एक पूरी प्रथा हिला दी (Literary Herm; महाराष्ट्र बोर्ड)।
बस यही सबक है। उन्होंने coverage माँगी नहीं। खुद coverage बन गए।
Educate. Agitate. Organize. ये blog पढ़ना Educate है। पर आज Agitate और Organize उन tools पर चलते हैं जो उनके पास नहीं थे — website, email list, blog, AI। Account ban होते हैं। Reels दबते हैं। जो चीज़ कोई shadowban नहीं कर सकता, वो है तेरा अपना platform।
Ambedkarite Educational Program इसी सोच से बना है — Prompt Engineering, Google AI, Website Building, Email Marketing, Blogging & SEO, Canva, और आगे आने वाले courses free। अगर अभी afford नहीं कर सकता तो coupon KUNALLONHARE लगाकर free ले ले। अगर कर सकता है तो ₹297 इस काम को चलाता रहेगा।
या Movement free join कर — email list से शुरुआत कर।
शिवराम जानबा कांबळे ने अपना अख़बार इसलिए छापा क्योंकि कोई उन्हें छापने को तैयार नहीं था। 120 साल बाद प्रेस free है। बहाना नहीं। ✊
तेरी क्या राय है भाई? नीचे कमेंट कर और इस article को उन लोगों तक भेज जो आज भी इस झूठ पर यकीन करते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
शिवराम जानबा कांबळे कौन थे?
पुणे के दलित लेखक, संपादक और संगठक। जन्म 1875, महार समाज से। 1904 में सोमवंशीय हितचिंतक मित्र समाज बनाया, 1908–1910 तक सोमवंशीय मित्र पत्रिका निकाली, और आंबेडकर-पूर्व काल के पहले दलित पत्रकार, मुद्रक, प्रकाशक व संपादक माने जाते हैं।
क्या शिवराम जानबा कांबळे ने आंबेडकर को भीमा कोरेगांव बुलाया था?
हाँ। इतिहासकार श्रद्धा कुंभोजकर के काम के अनुसार कांबळे ने ही 1 जनवरी 1927 को बाबासाहेब को कोरेगांव स्मारक पर सभा संबोधित करने बुलाया था। वो बाबासाहेब की पहली विज़िट थी।
सोमवंशीय मित्र क्या था?
1908 से 1910 तक चली मराठी मासिक पत्रिका। इसी में कांबळे ने महारों के लिए शिक्षा और फौजी भर्ती की माँग उठाई, और मुरळी-जोगतिन-देवदासी प्रथा के खिलाफ अभियान चलाया।
देवदासी प्रथा के खिलाफ उन्होंने क्या किया?
लेख लिखे, सभाएँ कीं, परिवारों से जेजुरी में बेटियाँ न चढ़ाने की अपील की। देवदासी शिबूबाई का खत छापा, उनकी शादी अपने साथी गणपतराव हनुमंतराव गायकवाड़ से कराई और उसका प्रचार किया। महाराष्ट्र बोर्ड की सामग्री के अनुसार 1909 में एक भी लड़की खंडोबा को नहीं चढ़ाई गई।
उनकी मृत्यु कब हुई?
Sources अलग-अलग हैं। Anupama Rao का academic काम 1875–1942 देता है। मराठी sources आमतौर पर 1940 कहते हैं। मराठी Wikipedia पर दर्ज नहीं है। कोई primary record verify नहीं हुआ।
स्रोत
- Anupama Rao, The Caste Question: Dalits and the Politics of Modern India, University of California Press, Ch. 1 — https://content.ucpress.edu/chapters/11115.ch01.pdf
- Columbia University, Ambedkar Timeline Project, 1900–1910 — https://ccnmtl.columbia.edu/projects/mmt/ambedkar/web/timeline_files/timeline_content03.html
- Indian History Collective, “The Contesting Memories of Bhima-Koregaon” (citing Shraddha Kumbhojkar) — https://indianhistorycollective.com/the-contesting-memories-of-bhima-koregaon/
- The Wire, “The Atrocities of Nationalism Offer History Lessons Beyond Bhima Koregaon” — https://thewire.in/caste/atrocities-nationalism-offer-history-lessons-beyond-bhima-koregaon
- The Wire, “On the History and Memory of the Battle of Koregaon” — https://thewire.in/history/battle-of-koregaon-memory
- The Mooknayak, “Remembering the Brave Mahar Soldiers of Bhima Koregaon” — https://en.themooknayak.com/dalit-news/dalit-history-month-special-maharashtras-proud-legacy-remembering-the-brave-mahar-soldiers-of-bhima-koregaon
- The News Minute, “Why Dalits should boycott Hindu temples” — https://www.thenewsminute.com/news/opinion-why-dalits-should-boycott-hindu-temples
- Maharashtra State Board, Class 8 History, Ch. 11 “Struggle for Equality” — https://maharashtraboardsolutions.com/maharashtra-board-class-8-history-solutions-chapter-11/
- Shaalaa, Maharashtra Board notes, “Religious Reform Movements” — https://www.shaalaa.com/concept-notes/religious-reform-movements_15230
- Wikipedia (Marathi), शिवराम जानबा कांबळे — https://mr.wikipedia.org/wiki/शिवराम_जानबा_कांबळे
- Wikipedia, Mahar Regiment — https://en.wikipedia.org/wiki/Mahar_Regiment
- CiNii Books record, H.N. Navalkar, Shivram Janba Kamble Yanche Charitra…, Sugava Prakashan, 1997 — https://ci.nii.ac.jp/ncid/BB18158119
- IJSRST, “Contribution of Dr B.R. Ambedkar in Nation Building” — https://ijsrst.com/paper/8647.pdf
- Scroll.in, “Why lakhs of Indians celebrate the British victory over the Maratha Peshwas every New Year” — https://scroll.in/article/801298/
