भीमा कोरेगांव की लड़ाई: पूरा सच, झूठ और सबूत

You are currently viewing भीमा कोरेगांव की लड़ाई: पूरा सच, झूठ और सबूत
Poster graphic on the battle of bhima koregaon 1818 showing the Vijay Stambh victory pillar in navy and gold. | भीमा कोरेगांव की लड़ाई 1818 पर नेवी और गोल्ड रंग का पोस्टर जिसमें विजय स्तंभ दिखाया गया है।

भीमा कोरेगांव की लड़ाई: पूरा सच, झूठ और सबूत

भीमा कोरेगांव की लड़ाई पर दो तरफ से हमला होता है। एक कहता है — Dalits गद्दार थे, अंग्रेज़ों का साथ दिया। दूसरा कहता है — वहाँ कुछ खास हुआ ही नहीं। दोनों एक साथ सही नहीं हो सकते। सच बोलूं तो दोनों ही गलत हैं।

सुन भाई, एक fact बताता हूँ जो दोनों side का argument तोड़ देगा 👇

चल, records देखते हैं।

भीमा कोरेगांव का इतिहास — 30 सेकंड में

1 जनवरी 1818। पुणे के पास भीमा नदी किनारे कोरेगांव गाँव। East India Company की एक छोटी टुकड़ी पर हमला हुआ (The Hindu, 2018)। ये तीसरे Anglo-Maratha War की आखिरी लड़ाइयों में से एक थी।

पेशवा बाजीराव द्वितीय के camp में करीब 28,000 लोग थे — 20,000 घुड़सवार, 8,000 पैदल (Indian Express, 2018)।

Captain Francis Staunton के साथ करीब 834 सैनिक थे। इनमें लगभग 500 महार community से (Indian Express, 2018)।

अब ध्यान से सुन। पेशवा ने 28,000 नहीं भेजे। करीब 2,000 भेजे — 600-600 की तीन टुकड़ियाँ, जिनमें अरब, गोसाईं और मराठा सैनिक थे (Indian Express, 2018)। करीब 12 घंटे बाद पेशवा की सेना पीछे हट गई, क्योंकि बड़ी British फौज आने की खबर थी।

तो WhatsApp वाला “500 महारों ने 28,000 को मार डाला” — वो बकवास है। छोड़ दे उसे। असली कहानी को उसकी ज़रूरत ही नहीं।

सामने वाले का argument, पूरी ताकत के साथ

कमज़ोर version मत उठा। उनका सबसे मज़बूत case यही है:

  1. लड़ाई का कोई साफ विजेता नहीं था। खुद British Resident Elphinstone ने इसे पेशवा के लिए “small victory” कहा (Indian Express, 2018)।
  2. हमला करने वाली सेना में ज़्यादातर अरब थे, ब्राह्मण नहीं।
  3. महार सैनिक दोनों तरफ थे।
  4. महार रेजिमेंट 1818 में थी ही नहीं — वो 1941 में बनी (Forefront for Ever, 1981)।
  5. इसे celebrate करना यानी colonialism को celebrate करना।

Serious list है। कुछ पॉइंट सीधे सही हैं। एक-एक करके देख।

जहाँ ये argument टूटता है

“कोई जीता ही नहीं” — Militarily ठीक। पर 1821 में अंग्रेज़ों ने जो खंभा वहाँ खड़ा किया, उस पर लिखा है कि Staunton की टुकड़ी ने “पूरब में British Army की सबसे गर्व वाली जीतों में से एक” हासिल की (Koregaon Pillar inscription, 1821)। उस खंभे पर 22 नाम “-nac” suffix वाले हैं — ये suffix सिर्फ महार सैनिक लगाते थे (Kumbhojkar, EPW, 2012)। असली बात यही है, win-loss column नहीं।

“पेशवा सेना ब्राह्मण नहीं थी” — बिल्कुल सही। पर पेशवाई एक सरकार थी, एक regiment नहीं। लड़ाई पुणे की सरकार और उसके कानूनों से थी।

“महार दोनों तरफ थे” — ये भी सच है, और खुलकर बोलना चाहिए। 1818 में जातियाँ सेनाओं में सफाई से बँटी नहीं थीं। पर उल्टा भी सोच — अगर कोई शिकायत नहीं थी, तो चार गुना बड़ी फौज के सामने 12 घंटे गाँव पकड़े रखने की वजह क्या थी?

“महार रेजिमेंट तब थी ही नहीं” — पूरा सच। 1 अक्टूबर 1941, बेलगाम (Forefront for Ever, 1981)। पर कांड ये है — उसी रेजिमेंट ने कोरेगांव का खंभा अपने crest पर रखा, आज़ादी तक (Forefront for Ever, 1981)। यानी रेजिमेंट ने याद नहीं बनाई — याद ने रेजिमेंट का badge बनाया।

“तुम colonialism celebrate कर रहे हो” — सबसे तीखा सवाल। और Babasaheb ने खुद इसका जवाब दिया है। आगे देख।

क्या दलितों ने अंग्रेज़ों की मदद की? बाबासाहेब का जवाब

उन्होंने छुपाया नहीं। लिखकर रखा।

The Untouchables and the Pax Britannica में वो पूछते हैं कि Company की फौज में असल में कौन भरता था, और जवाब देते हैं — जो लोग East India Company की सेना में गए वो भारत के अछूत थे। Plassey में Clive के साथ दुसाध लड़े, कोरेगांव में महार (BAWS Vol 12, The Untouchables and the Pax Britannica)।

फिर वो line जो कोई quote नहीं करता — गद्दारी हो या न हो, अछूतों का ये काम बिल्कुल स्वाभाविक था (BAWS Vol 12, The Untouchables and the Pax Britannica)।

देख, उन्होंने आरोप का नाम लिया। Facts से इनकार नहीं किया। उन्होंने सवाल ये उठाया — जो समाज तुझे सड़क, पानी और स्कूल नहीं देता, उसे वफादारी किस बात की?

और उसी manuscript में उन्होंने British Raj की धज्जियाँ उड़ाईं — कि अंग्रेज़ों ने अछूतपन खत्म करने के लिए कुछ नहीं किया, बस पुराना social order विरासत में ले लिया (BAWS Vol 12)। बाबासाहेब अंग्रेज़ों के fan नहीं थे। वो सबूत के fan थे।

पेशवाई में ज़िंदगी — ये हिस्सा कोई quote नहीं करता

यहीं “ये तो बस colonial लड़ाई थी” वाला argument खत्म हो जाता है।

Annihilation of Caste में बाबासाहेब ने नियम दर्ज किए हैं। पेशवाई में अछूत सार्वजनिक रास्ते पर नहीं चल सकता था अगर सामने से कोई हिंदू आ रहा हो — परछाईं से अपवित्रता का डर। पुणे में कमर से झाड़ू बाँधनी पड़ती थी, ताकि अपने पैरों के निशान खुद मिटा सके। और गले में मटका, थूक के लिए (BAWS Vol 1, Annihilation of Caste)।

ये सिर्फ Ambedkarite source नहीं है। R.V. Russell, जो colonial Superintendent of Ethnography था, उसने भी यही दर्ज किया — The Tribes and Castes of the Central Provinces of India (Russell, 1916)। दो बिल्कुल अलग लेखक, एक ही detail।

अब सोच। महार सैनिक पेशवा सेना में कम क्यों थे, और Company की वर्दी में वाले 12 घंटे क्यों डटे रहे।

जो राज्य तेरी परछाईं नापता हो, उसके लिए कोई नहीं लड़ता।

एक बात और। 1894 वाली महार भर्ती की petition बाबासाहेब को सालों बाद मिली — अपने पिता के पुराने कागज़ों के बंडल में (Forefront for Ever, 1981)। उनके पिता सैनिक थे। शुरुआत एक document से हुई। आज हमारी लड़ाई search results, feeds और AI answers पर तय होती है — और यही skills Ambedkarite Educational Program में सिखाई जाती हैं।

1892 — जब अंग्रेज़ों ने महारों को भी फेंक दिया

अगर अंग्रेज़ महारों से इतना प्यार करते थे, तो किसी ने अंग्रेज़ों को बताया नहीं।

मई 1892 में Government of India ने महारों की भर्ती बंद कर दी। उन्हें “non-martial race” घोषित कर दिया (Kumbhojkar, EPW, 2012)। इससे पहले Bombay Army का लगभग पाँचवाँ से चौथाई हिस्सा महार थे।

गोपाल बाबा वलंगकर, जो खुद पूर्व सैनिक थे, उन्होंने 1894 में petition लिखी। शिवराम जानबा कांबले ने 1904 में (Forefront for Ever, 1981)। कई pensioners ने साइन करने से मना कर दिया — pension जाने के डर से।

जून 1917 में 111th Mahars बटालियन बनी, क्योंकि पहले विश्वयुद्ध में अंग्रेज़ों को आदमी चाहिए थे। 1920 में merge, मार्च 1921 में disband (Forefront for Ever, 1981)।

तो “अंग्रेज़ों ने अपने दलित साथियों को इनाम दिया” वाली कहानी ढह जाती है। Company ने इस्तेमाल किया, फिर Raj ने दरवाज़ा बंद कर दिया। बस यही पूरा arc है।

बाबासाहेब ने वो दरवाज़ा खुद खोला। जुलाई 1941 में Viceroy की Defence Advisory Committee में आए, महार रेजिमेंट के लिए दबाव डाला। 1 अक्टूबर 1941 को बेलगाम में पहली बटालियन खड़ी हुई (Forefront for Ever, 1981)।

विजय स्तंभ कोरेगांव और 1 जनवरी 1927

वो खंभा सौ साल तक बस एक British war memorial था।

फिर शिवराम जानबा कांबले ने बाबासाहेब को सालाना कार्यक्रम में बुलाया। 1 जनवरी 1927 को बाबासाहेब विजय स्तंभ कोरेगांव पर जाकर श्रद्धांजलि दी (Indian History Collective, 2020)। उसके बाद हर साल जाते रहे।

उस एक visit ने मतलब पलट दिया। एक colonial खंभा receipt बन गया — सबूत कि जिन्हें हथियार उठाने के लायक नहीं माना गया, उन्होंने हथियार उठाए और डटे रहे।

ढाई महीने बाद, 20 मार्च 1927, उसी आदमी ने महाड सत्याग्रह किया — सार्वजनिक तालाब से पानी पीने के हक के लिए (Indian Express, 2016)। एक ही साल। एक ही argument, अलग मोर्चा।

आज हर 1 जनवरी को लाखों लोग शौर्य दिवस पर कोरेगांव भीमा पहुँचते हैं (The Hindu, 2018)।

जो हमें भी मानना चाहिए

Fact-first मतलब fact-first — चाहे अपनी side को चुभे। चार सुधार:

  • “500 ने 28,000 को हराया” — नहीं। करीब 834 सैनिक, जिनमें ~500 महार, ने 28,000 के camp से भेजे गए ~2,000 को रोका (Indian Express, 2018)।
  • “28,000 मारे गए” — नहीं। गाँव में करीब 50 लाशें मिलीं, ज़्यादातर पेशवा के अरब सैनिक (Indian Express, 2018)।
  • “महार रेजिमेंट ने जीती” — नहीं। वो 1941 में बनी (Forefront for Ever, 1981)।
  • “ये साफ जाति-युद्ध था” — नहीं। महार दोनों तरफ थे (Indian Express, 2018)।

आनंद तेलतुंबडे ने आंदोलन के अंदर से ही तर्क दिया है कि इसे सिर्फ महार vs ब्राह्मणवादी पेशवाई बताना एक myth है (Teltumbde, Janata Weekly, 2018)। तुझे उनसे सहमत होना ज़रूरी नहीं। पर जवाब देना आना चाहिए — और वो बिना checked forward के नहीं होता।

देख, symbol इन चारों सुधारों के बाद भी ज़िंदा रहता है। बाबासाहेब ने इसे documented बहादुरी और documented अपमान पर खड़ा किया था, body count पर नहीं।

ये झूठ बार-बार क्यों लौटता है

Argument मत देख, इस्तेमाल देख।

भीमा कोरेगांव की लड़ाई को गद्दारी बताने से एक ही काम होता है। एक पूरे समुदाय को आज anti-national कहा जा सकता है — उस काम के लिए जो उनके पूर्वजों ने ऐसी सरकार के नीचे किया, जो उन्हें गंदगी मानती थी। इज़्ज़त की माँग को वफादारी के सवाल में बदल देना। Classic move।

और ये symbol सच में असहज है। एक memorial जो साबित करता है कि “अछूत” लड़े और डटे, वो जाति व्यवस्था की पूरी बुनियाद तोड़ देता है (Kumbhojkar, EPW, 2012)।

इसलिए हमला करने वाले कभी बाबासाहेब के असली paragraph से नहीं लड़ते। वो WhatsApp forward से लड़ते हैं। यही खेल है। मत फँस।

एक ज़रूरी बात: 2018 की कोरेगांव भीमा हिंसा और Elgar Parishad केस अभी अदालतों में हैं (The Hindu, 2018)। ये article किसी जीवित व्यक्ति के दोष या निर्दोष होने पर कोई दावा नहीं करता। वो अदालत का काम है।

निचोड़

भीमा कोरेगांव की लड़ाई के सबूत बोरिंग हैं और public हैं। करीब 834 लोग, 12 घंटे, एक गाँव। एक खंभे पर 22 महार नाम।

1927 में बाबासाहेब ने उस खंभे में काबिलियत का सबूत देखा — किसी की वफादारी का नहीं।

Numbers सही कर ले। फिर ये argument कोई तुझसे नहीं जीत सकता। 💪

बाबासाहेब ने तीन शब्द दिए: Educate. Agitate. Organize.

ये blog पढ़ना “Educate” है। पर Agitate और Organize के लिए औज़ार चाहिए। 1894 में वलंगकर का हथियार petition था। 2026 में लड़ाई search results, feeds और AI answers पर है — और वो वही जीतता है जो लिखना, publish करना और rank करना सीखता है।

Ambedkarite Educational Program इसी काम के लिए बना है — ₹297 lifetime, जिसमें Prompt Engineering, Google AI, Website Building, Email Marketing, Blogging & SEO और Canva शामिल हैं, और आगे आने वाले सारे courses free। अगर अभी ₹297 भारी पड़ रहे हैं तो coupon KUNALLONHARE लगाकर free ले ले। पैसा तभी दे जब दे सकता हो, और जब लगे कि काम support के लायक है।

या Movement free join कर — email list से शुरुआत कर। 📚

तेरी क्या राय है भाई? नीचे कमेंट कर और इस article को उन लोगों तक भेज जो आज भी इस झूठ पर यकीन करते हैं।

P.S. — फैलाने के साथ कमाना भी है तो affiliate program देख ले।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भीमा कोरेगांव की लड़ाई कौन जीता?
Militarily कोई साफ जीत नहीं हुई। Staunton की टुकड़ी ने करीब 12 घंटे गाँव पकड़े रखा और पेशवा की सेना पीछे हट गई। तीसरा Anglo-Maratha War पेशवा की हार से खत्म हुआ, इसलिए इसे Company की जीत माना जाता है।

क्या 500 महारों ने 28,000 को हराया था?
नहीं। Company की टुकड़ी में करीब 834 सैनिक थे, जिनमें ~500 महार। पेशवा के 28,000 के camp में से करीब 2,000 हमले पर भेजे गए। गाँव में करीब 50 लाशें मिलीं।

दलित भीमा कोरेगांव क्यों celebrate करते हैं?
कोरेगांव खंभे पर 22 महार नाम हैं। जिस समुदाय को कहा गया कि वो हथियार उठाने लायक नहीं, उसके लिए ये उल्टा सबूत है। बाबासाहेब 1 जनवरी 1927 को विजय स्तंभ गए और वहीं से शौर्य दिवस की परंपरा शुरू हुई।

क्या अंग्रेज़ों के लिए लड़कर दलितों ने गद्दारी की?
बाबासाहेब ने The Untouchables and the Pax Britannica में सीधा जवाब दिया — गद्दारी हो या न हो, ये काम स्वाभाविक था। उसी manuscript में उन्होंने British Raj की भी कड़ी आलोचना की।

क्या पेशवा की सेना पूरी ब्राह्मण थी?
नहीं। हमला करने वाली टुकड़ियों में अरब, गोसाईं और मराठा सैनिक थे, और सबसे ज़्यादा नुकसान अरब बटालियन को हुआ।

  1. BAWS Vol 12, The Untouchables and the Pax Britannica (full text PDF) — https://www.bhsbs.org/wp-content/uploads/2018/04/the-untouchables-and-the-pax-britannica.pdf
  2. Indian Express — “Battle of Koregaon: Why the Dalits hate Peshwas and celebrate this British ‘victory'” — https://indianexpress.com/article/research/battle-of-koregaon-dalits-mahar-maratha-peshwa-maharashtra-protests-5010172/
  3. Indian History Collective — “The Contesting Memories of Bhima-Koregaon” — https://indianhistorycollective.com/the-contesting-memories-of-bhima-koregaon/
  4. Forward Press — “The end of the Peshwai at the hands of the Mahars and Mangs” — https://www.forwardpress.in/2015/01/the-end-of-the-peshwai-at-the-hands-of-the-mahars-and-mangs/

UNVERIFIED CLAIMS LOG

ClaimStatusRecommendation
“Sidhnak Mahar went to Baji Rao II offering Mahar service and was insulted”Circulates widely, no primary-source document found. Appears in Mahar Regiment oral tradition, not in contemporary records.Dropped from article. Keep it out unless you find the Longer (1981) page reference.
Exact count “22 Mahar names” vs “23 -nac names”Sources differ — Mahar Regiment records say 22, Kumbhojkar’s EPW paper says 23 of 49 carry “-nac”.Used 22 (regiment record). Safe either way; flag if a reader challenges.
“Baji Rao II personally ordered the pot-and-broom rule”Ambedkar (BAWS Vol 1) and Russell (1916) confirm the practice in Poona under Peshwa rule. No document ties it to a specific Baji Rao II order.Article says “under the Peshwas”, not “Baji Rao II ordered”. Correct as written.
Savarkar supporting Ambedkar’s 1927 Mahar recruitment demandSourced only to Swarajya citing Longer (1981). Not independently confirmed.Dropped. Politically loaded, single-source.
Elphinstone’s exact “small victory” wordingAppears in Indian Express and Wikipedia citing Elphinstone’s dispatch. Original dispatch not directly accessed.Kept with “(Indian Express, 2018)” attribution, not as a direct Elphinstone citation.

भीमा कोरेगांव की लड़ाई thanks for reading!

Spread the love

Leave a Reply