पूना पैक्ट क्या है? पूना समझौते को समझना आधुनिक भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं की व्याख्या और मूल्यांकन के लिए अत्यंत आवश्यक है। गांधी और आंबेडकर के बीच बहस को अक्सर राजनीतिक बहस के रूप में वर्णित किया जाता है और सामान्यतः इसे सतही तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। वास्तव में, यह सामाजिक सुधार तथा विशेषाधिकार प्राप्त वर्णों और अस्पृश्यता के अंतिम उन्मूलन के बारे में एक गहन बहस थी।
इस अध्ययन में, हम पूना समझौते की परिस्थितियों और विवरणों की पहचान करने, अस्पृश्यता, वर्ण और सामाजिक सुधार के संबंध में गांधी और आंबेडकर के बीच असहमति के कारणों का विश्लेषण करने, चुनावी प्रक्रिया पर पूना समझौते के प्रभाव का मूल्यांकन करने और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के संबंध में आंबेडकर की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने की आशा करते हैं।
पूना समझौता और 1932 का पृथक निर्वाचन
1909 के पृथक निर्वाचन अधिनियम ने धार्मिक और सामाजिक अल्पसंख्यकों को केंद्रीय विधानमंडल में अपने प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया। 1932 में ब्रिटिश संसद ने इस अधिनियम में संशोधन किया और केंद्रीय विधानमंडल में ‘दलित वर्गों’ के लिए 71 सीटें आरक्षित कीं। इनमें से प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि का चुनाव एक सामाजिक समूह द्वारा किया जाना था। ‘दलित वर्ग‘ ब्रिटिश संसद द्वारा अस्पृश्यों को दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया गया एक अशुद्ध शब्द था। सांप्रदायिक निर्णय काफी विवादास्पद था और इसके कारण पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन हुए। इस मुद्दे को हल करने के प्रयास में गांधी और आंबेडकर 24 सितंबर, 1932 को पूना समझौते के नाम से जाने जाने वाले एक समझौते पर पहुँचे।
राउंड टेबल इंडिया के अनुसार, पूना समझौते ने आरक्षित सीटों की संख्या 71 से बढ़ाकर 147/148 कर दी। साथ ही, इसने पृथक सामाजिक निर्वाचन को भी रद्द कर दिया।
गांधी के आमरण अनशन तक ले जाने वाली घटनाएँ
इस बहस का नाम उस तारीख से लिया गया है, जब महात्मा गांधी ने 20 सितंबर 1932 को यरवडा में कैद रहते हुए आमरण अनशन शुरू किया था। द क्विंट के अनुसार, उनका मानना था कि ब्रिटिश हिंदू समाज को तोड़ने के लिए फूट डालो और राज करो की रणनीति का इस्तेमाल कर रहे थे। विकिपीडिया में बताया गया है कि उनका अनशन सांप्रदायिक निर्णय और विशेष रूप से पृथक निर्वाचन के प्रावधान के विरोध में था।
एक समझौता हुआ
द क्विंट के अनुसार, इस अनशन ने आंबेडकर पर काफी दबाव डाला और अंततः एक समझौता किया गया। राउंड टेबल इंडिया के अनुसार, यह समझौता पी. मालवीय (हिंदू महासभा के प्रतिनिधि) और आंबेडकर द्वारा तैयार किया गया था, तथा गांधी का प्रतिनिधित्व करने के लिए पहले और दलित वर्गों का प्रतिनिधित्व करने के लिए दूसरे ने इस पर हस्ताक्षर किए। समझौते के बाद गांधी ने अपना अनशन समाप्त कर दिया।
वर्ण और जाति पर गांधी-आंबेडकर का मतभेद
एक अन्य विश्लेषण से पता चलता है कि गांधी ने वर्ण और जाति के बीच अंतर किया। उनके मत में, वर्ण व्यवस्था सामाजिक और आर्थिक कार्यों की एक पदानुक्रमित और वंशानुगत व्यवस्था थी। गांधी के अनुसार, जाति व्यवस्था वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप थी और अस्पृश्यता वह बुराई थी जिसे हिंदू धर्म से दूर किया जाना आवश्यक था (अनंतम IAS)। दूसरी ओर, SIES के अनुसार, आंबेडकर वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था को एक ही मानते थे और इसलिए दोनों को अस्वीकार किया जाना चाहिए था (SIES)।
अनंतम IAS के अनुसार, 1932 में गांधी ने दलित वर्गों को दर्शाने के लिए ‘हरिजन’ शब्द का भी इस्तेमाल किया। द लीफलेट के अनुसार, दलितों के लिए संरक्षणात्मक भाव से एक शब्द गढ़ना अप्रिय था और इसलिए दलितों द्वारा ‘हरिजन’ शब्द को भी पसंद नहीं किया जाता है (द लीफलेट)।
जैसा कि हमारे अन्य लेख में चर्चा की गई है, आंबेडकर की दृष्टि में, पृथक निर्वाचन का अर्थ था कि दलित वर्गों को राजनीतिक रूप से अपना प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिलेगा। हमारा लेख इस अवधारणा के संदर्भ और पृष्ठभूमि को भी विस्तार से बताता है। 1945 में प्रकाशित लेख “कांग्रेस और गांधी ने अस्पृश्यों के साथ क्या किया” में, अनंतम IAS के अनुसार, आंबेडकर ने लिखा कि गांधी के अनशन के प्रभाव के कारण उन्हें उस एकमात्र माध्यम को त्यागने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसके द्वारा उनका समुदाय स्वतंत्र राजनीति प्राप्त कर सकता था (अनंतम IAS)।
गांधी और आंबेडकर के बीच वास्तविक अंतर क्या था?
गांधी और आंबेडकर के बीच मूलभूत अंतर हिंदू धर्म में जाति व्यवस्था की भूमिका को लेकर था। गांधी का मानना था कि हिंदू धर्म को एकजुट रखने के लिए जाति व्यवस्था आवश्यक थी और इसके बिना धर्म विघटित हो जाएगा (CVS)। इसलिए, गांधी जाति व्यवस्था में सुधार करना चाहते थे। दूसरी ओर, आंबेडकर का मत था कि जाति व्यवस्था अस्पृश्यता का आधार थी और सामाजिक व्यवस्था का वास्तविक परिवर्तन तभी संभव होगा जब जाति व्यवस्था का पूरी तरह उन्मूलन किया जाए (CVS)।
दृष्टि IAS के अनुसार, गांधी अस्पृश्यता को एक ऐसी बुराई मानते थे जिसे आध्यात्मिक साधनों द्वारा लोगों के हृदय और आत्मा को शुद्ध करके समाप्त किया जाना चाहिए और इसलिए, आंबेडकर की तुलना में अस्पृश्यता के बारे में अधिक निराशावादी दृष्टिकोण रखते थे। आंबेडकर आशावादी दृष्टिकोण रखते थे और इसके कानूनी तथा सामाजिक उन्मूलन की मांग करते थे (दृष्टि IAS; द लीफलेट)।
आंबेडकरवादी दृष्टिकोण
आंबेडकरवादी दृष्टिकोण यह है कि अस्पृश्यता एक सामाजिक बुराई थी और इसलिए गांधी तथा आंबेडकर दोनों को इसके विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। फिर भी, अस्पृश्यता की बुराई के कारण और उसके उपचार के संबंध में उनके विचार एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत थे। इस दार्शनिक अंतर का समाधान पूना समझौते के माध्यम से हुआ, जिसे आंबेडकर स्वयं नैतिक दबाव में किया गया समझौता मानते थे।
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निष्कर्ष
पूना समझौता क्या है? यह 1932 में महात्मा गांधी और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के बीच हुआ समझौता है। यह केंद्रीय विधानमंडल में अस्पृश्यों के प्रतिनिधित्व से संबंधित था। आंबेडकर ने मांग की थी कि अस्पृश्यों को पृथक निर्वाचन प्रदान किया जाए। गांधी इसके विरुद्ध थे। अंततः, आंबेडकर ने गांधी की स्थिति स्वीकार कर ली और पृथक निर्वाचन की मांग त्याग दी। यह समझौता और इसके लिए उत्तरदायी परिस्थितियाँ जाति-विरोधी आंदोलनों के अध्ययन में महत्वपूर्ण हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पूना पैक्ट क्या है?
यह 24 सितंबर, 1932 को मोहनदास गांधी और बी. आर. आंबेडकर के बीच हुए समझौते को संदर्भित करता है, जब दोनों नेता येर्वदा जेल में कैद थे। इस समझौते ने अछूतों के सदस्यों को चुनावों के लिए खड़े होने की अनुमति दी, जो पहले उन्हें नहीं दी गई थी, संयुक्त मतदाता-मंडल के भीतर आरक्षित सीटों से (Wikipedia)।
1932 का सांप्रदायिक पुरस्कार क्या था?
यह पुरस्कार अगस्त, 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री, रामसे मैकडोनाल्ड द्वारा जारी किया गया था। इस पुरस्कार के अंतर्गत, ब्रिटिश सरकार ने दलित वर्गों को 71 आरक्षण आवंटित किए और उन्हें पृथक निर्वाचन-क्षेत्र रखने की अनुमति दी (Wikipedia)।
गांधी ने अनिश्चितकालीन उपवास करने के लिए क्या प्रेरित किया?
गांधी पृथक निर्वाचन-क्षेत्र की व्यवस्था के कड़े विरोधी थे। उनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार ने जानबूझकर हिंदू समुदाय को विभाजित करने के लिए पृथक निर्वाचन-क्षेत्र पेश किए। इसलिए, उन्होंने पृथक निर्वाचन-क्षेत्र की व्यवस्था के विरोध में 20 सितंबर, 1932 को अपना उपवास शुरू किया (The Quint; Wikipedia)।
वर्ण व्यवस्था पर गांधी के और आंबेडकर के विचार कैसे अलग थे?
गांधी वर्ण व्यवस्था के समर्थन में थे क्योंकि वे इसे वर्ग व्यवस्था मानते थे। दूसरी ओर, आंबेडकर ने वर्ण व्यवस्था के साथ-साथ जाति व्यवस्था को भी पूरी तरह अस्वीकार कर दिया (Anantam IAS; SIES)।
बाद के वर्षों में पूना पैक्ट पर आंबेडकर की राय क्या थी?
आंबेडकर ने पूना पैक्ट को एक दुर्भाग्यपूर्ण समझौता बताया, जिसे स्वीकार करने के लिए उन्हें मजबूर किया गया था (Savai
SOURCES
- Wikipedia (Poona Pact, दो mirror pages): https://en.wikipedia.org/wiki/Poona_Pact
- The Quint: https://www.thequint.com/amp/story/news/politics/fast-unto-vote-gandhi-ambedkar-and-separate-electorates-for-dalits
- Round Table India: https://roundtableindia.co.in/?p=138532
- Anantam IAS (Poona Pact timeline): https://anantamias.com/poona-pact/
- Anantam IAS (Gandhi-Ambedkar PSIR): https://anantamias.com/psir-gandhi-and-ambedkar/
- Eternal Gandhi: https://gandhistory.in/relevance-untouchability.php
- SIES: https://www.siesoiop.in/?p=13306
- The Leaflet: https://theleaflet.in/?p=27560
- Drishti IAS: https://drishtiias.com/pdf/1724937305.pdf
- CVS: https://www.cvs.edu.in/upload/Ambedkar%20Gandhi%20Debate.pdf

