एंट्स अमंग एलिफेंट्स किताब: सुजाता गिडला की सच्ची कहानी

You are currently viewing एंट्स अमंग एलिफेंट्स किताब: सुजाता गिडला की सच्ची कहानी
Ants among elephants: navy and gold cover with an open book and ant icon for the summary and review | एंट्स अमंग एलिफेंट्स किताब — सुजाता गिडला की Dalit memoir — ambedkarite.in

एंट्स अमंग एलिफेंट्स किताब: सुजाता गिडला की सच्ची कहानी

एंट्स अमंग एलिफेंट्स किताब? एंट्स अमंग एलिफेंट्स सुजाता गिडला द्वारा लिखित एक पारिवारिक संस्मरण है और इसे हमारे समय के सबसे प्रभावशाली दलित संस्मरणों में से एक माना जाता है। इसे 2017 में हार्परकॉलिन्स इंडिया द्वारा प्रकाशित किया गया था। संस्मरण का पूरा शीर्षक “एंट्स अमंग एलिफेंट्स: एन अनटचेबल फैमिली एंड द मेकिंग ऑफ मॉडर्न इंडिया” है।

‘एंट्स अमंग एलिफेंट्स’ एक रूपक है और इसे पुस्तक के अंत की ओर समझाया गया है। आत्मकथात्मक प्रारूप में लिखे गए दलित संस्मरण दलित साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं। निम्नलिखित अनुच्छेदों में हम सुजाता गिडला, पुस्तक में चित्रित परिवार, आंध्र प्रदेश के दलितों के इतिहास के लिए पुस्तक की प्रासंगिकता तथा पुस्तक को मिले पुरस्कारों और आलोचनाओं पर चर्चा करेंगे।

सुजाता गिडला का प्रारंभिक जीवन और करियर

गिडला का जन्म आंध्र प्रदेश के खज़ीपेट (काज़ीपेट) में एक माला (दलित) परिवार में हुआ और उन्होंने अपना बचपन काकीनाडा में एल्विन पेटा नामक दलित बस्ती में बिताया (उदयवाणी, 2017)। 18 वर्ष की आयु में गिडला ने मास्टर डिग्री करने के लिए वारंगल का रुख किया (द लेडीज़ फिंगर)। 26 वर्ष की आयु में वह अमेरिका चली गईं और वर्तमान में न्यूयॉर्क में मेट्रो कंडक्टर के रूप में काम कर रही हैं (उदयवाणी, 2017)।

डॉन में प्रकाशित एक समीक्षा के अनुसार, गिडला कहती हैं, “मेरे परिवार की कहानियाँ भारत में कहानियाँ नहीं थीं। वे रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा थीं। वे तभी कहानियाँ बनीं जब मैं एक अलग देश में चली गई और नए संबंध बनाने लगी।” (डॉन, हमारा अनुवाद)

किताब में किसकी कहानी है

गिडला की पुस्तक की कहानी उनके परिवार की तीन पीढ़ियों की महिलाओं तक फैली हुई है, हालांकि कहानी मुख्यतः स्वयं गिडला की है। पुस्तक का केंद्र गिडला की माँ मंजुला और गिडला के मामा के.जी. सत्यमूर्ति (कॉमरेड एसएम) हैं। कॉमरेड एसएम आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध मार्क्सवादी और नक्सलवादी कवि तथा पीपुल्स वॉर ग्रुप के सह-संस्थापक हैं (उदयवाणी, 2017; लिटरेरी रिव्यू)। बड़े होते समय सत्यम गिडला के लिए नायक थे, जैसा कि गिडला अपनी पुस्तक में उन्हें “फिल्मी नायक” के रूप में वर्णित करती हैं (लिटरेरी रिव्यू)।

गिडला के परदादा-परदादी वे दलित थे जिन्होंने 1930 के दशक में आंध्र प्रदेश के खम्मम ज़िले में ईसाई धर्म अपना लिया था। कनाडाई मिशनरियों के संपर्क में आने के बाद परिवार ने ईसाई धर्म अपना लिया और मिशन स्कूल प्रणाली का हिस्सा बन गया। उस समय हिंदू व्यवस्था में दलितों के लिए ऐसी स्कूल प्रणाली पहुँच से बाहर थी (उदयवाणी, 2017; पॉपमैटर्स)।

आंध्र प्रदेश के दलित इतिहास से जुड़ाव

यह पुस्तक आंध्र प्रदेश के दलित इतिहास और स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के भारत के शुरुआती वर्षों को समर्पित है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह एक समुदाय की गवाही है। इस पुस्तक का ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्व है। लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स ने कहा कि यह पुस्तक उत्तर-औपनिवेशिक काल का इतिहास प्रस्तुत करती है, अर्थात तेलंगाना में हुए प्रमुख किसान विद्रोह का उदय और उस समय सभी अछूत परिवारों को अपने ज्येष्ठ पुत्रों को ज़मींदारों के हवाले करना पड़ता था (लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स)।

इसके अतिरिक्त, लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स के अनुसार, यह पुस्तक भारत में वामपंथी आंदोलनों का इतिहास भी प्रस्तुत करती है और बताती है कि वामपंथी कतारों के भीतर अछूतों ने सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष किया, लेकिन अन्य, उच्च जातियों द्वारा उत्पीड़ित बने रहे (लंदन रिव्यू ऑफ बुक्स)। इसके अलावा, प्रॉस्पेक्ट पत्रिका के अनुसार, पुस्तक उजागर करती है कि ईसाई मिशनरियों के इस क्षेत्र में आने से पहले आंध्र प्रदेश के अछूतों की शिक्षा तक बिल्कुल भी पहुँच नहीं थी (प्रॉस्पेक्ट पत्रिका)।

एंट्स अमंग एलिफेंट्स: समीक्षा

पुस्तक को 2018 के शक्ति भट्ट प्रथम पुस्तक पुरस्कार के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था और इसे अनुकूल समीक्षाएँ मिलीं (द लेडीज़ फिंगर)। भारत का दलित इतिहास प्रतिरोध का इतिहास है। आज भारत में अनुमानतः 30 करोड़ दलित हैं और सुजाता गिडला का परिवार ईसाई आस्था और शिक्षा के कारण भारत के सौभाग्यशाली दलितों में था (डॉन)।

हर समीक्षा प्रशंसात्मक नहीं है। लिटरेरी रिव्यू में केशव गुहा उल्लेख करते हैं कि यद्यपि संस्मरण प्रभावशाली है, लेकिन सामाजिक या राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने पर इसमें विश्वसनीयता की कमी है, जिसका मुख्य कारण लेखक के कलात्मकता बनाए रखने के प्रयास हैं (लिटरेरी रिव्यू)। गुहा यह भी कहते हैं कि ब्रिटिश पाठक गलती से यह मान सकते हैं कि इस रचना के माध्यम से वे पूरी “दलित कहानी” पढ़ रहे हैं। इसी वर्ष पुरस्कार के लिए मीना कंदासामी की रचना सहित अन्य रचनाएँ भी शॉर्टलिस्ट की गई थीं (लिटरेरी रिव्यू)।

एक आंबेडकरवादी दृष्टिकोण

जाति पर अनेक विद्वानों ने विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा की है। पॉपमैटर्स अपनी समीक्षा में उल्लेख करता है कि एंट्स अमंग एलिफेंट्स की एक विशेषता यह है कि यह स्वयं को श्रमिक-वर्ग और कार्यकर्ता परिवारों के संदर्भ में स्थापित करती है और नीचे से जाति का वर्णन करती है (पॉपमैटर्स)। यह रचना उन परिवारों को आवाज़ देती है जो अक्सर इतिहासकारों के दायरे से बाहर रह जाते हैं।

व्यापक दृष्टिकोण से, यह अत्यंत आवश्यक है कि आंबेडकरवादी रचनाओं और दलितों की आवाज़ों का दस्तावेजीकरण स्वयं दलितों द्वारा किया जाए, न कि यूरोपीय विद्वानों और समीक्षकों द्वारा। एईपी बहुत ही मामूली लागत पर विभिन्न डिजिटल उपकरणों का प्रशिक्षण प्रदान करता है। यह सरकारी वित्तपोषण पर निर्भर नहीं है और आजीवन पहुँच प्रदान करता है (https://ambedkarite.in/courses/ambedkarite-educational-program/)। दूसरा विकल्प एईपी आंदोलन से जुड़ना है (https://ambedkarite.in/movement/)।

निष्कर्ष

सुजाता गिडला की पुस्तक एंट्स अमंग एलिफेंट्स उनके परिवार की कहानी बताती है। गिडला विशेष रूप से अपनी माँ मंजुला और अपनी माँ के भाई के.जी. सत्यमूर्ति पर ध्यान केंद्रित करती हैं। गिडला की कहानी आंध्र प्रदेश के दलितों का इतिहास भी बताती है। पाठकों को गिडला के परिवार के अनुभवों के माध्यम से भारत की स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों की झलक मिलती है। गिडला की पुस्तक की व्यापक प्रशंसा हुई और इसे एक प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। जहाँ अनेक लोगों ने पुस्तक की सराहना की, वहीं कुछ आलोचकों ने तर्क दिया कि विशेष रूप से सत्यमूर्ति की कहानी को पूरी दलित कहानी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एंट्स अमंग एलिफेंट्स किसने लिखी?

सुजाता गिडला का जन्म आंध्र प्रदेश में एक दलित (माला जाति) परिवार में हुआ था। आज, 67 वर्ष की आयु में, गिडला न्यूयॉर्क की मेट्रो में कंडक्टर के रूप में काम करती हैं (उदयवाणी, 2017)।

एंट्स अमंग एलिफेंट्स की कहानी क्या है?

कहानी लेखिका के परिवार की तीन पीढ़ियों पर केंद्रित है और विशेष रूप से मंजुला तथा कॉमरेड एसएम, यानी सत्यमूर्ति, पर आधारित है (लिटरेरी रिव्यू)।

पुस्तक ने कौन से पुरस्कार जीते?

गिडला की पुस्तक को 2018 के शक्ति भट्ट प्रथम पुस्तक पुरस्कार के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था (द लेडीज़ फिंगर)।

क्या पुस्तक की सभी समीक्षाएँ सकारात्मक हैं?

अधिकांश समीक्षाएँ पुस्तक की सराहना करती हैं। हालांकि, लिटरेरी रिव्यू के केशव गुप्ता इस पुस्तक को एक शक्तिशाली संस्मरण के रूप में आंकते हैं। लेकिन, वे तर्क देते हैं कि दलित इतिहास के बड़े, सामाजिक संस्मरण के लिए इस पुस्तक पर निर्भर होना अनुचित है (लिटरेरी रिव्यू)।

SOURCES

  1. Udayavani (2017): https://www.udayavani.com/english-news/us-based-sujatha-gidla-to-pen-memoir-on-life-as-a-dalit
  2. Prospect Magazine: https://prospectmagazine.co.uk/magazine/ants-among-elephants-exposes-the-reality-of-caste-in-modern-india
  3. PopMatters: https://popmatters.com/riveting-account-of-left-wing-politics-and-casteism-in-india-2511324059.html
  4. Dawn: https://www.dawn.com/news/amp/1417180
  5. London Review of Books (Tariq Ali): https://lrb.co.uk/v40/n16/tariq-ali/the-unseeables
  6. Literary Review (Keshava Guha): https://literaryreview.co.uk/?p=11523
  7. The Ladies Finger: https://www.google.co.in/amp/theladiesfinger.com/ants-among-elephants-sujatha-gidla/amp/
Spread the love

Leave a Reply