एससी एसटी एक्ट क्या है? अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 को एससी/एसटी अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है। यह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को देश के अन्य नागरिकों द्वारा उनके विरुद्ध किए गए अत्याचारों और अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने वाला कानून है (जनजातीय कार्य मंत्रालय, अधिनियम का पाठ)। यह 11 सितंबर 1989 को अस्तित्व में आया और 30 जनवरी 1990 को लागू किया गया (विकिपीडिया)।
2023 में अधिनियम के तहत कुल 53,372 मामले दर्ज किए गए (2024 के आँकड़े, PIBUK; SCC Online)। 2024 में अधिनियम से जुड़े 2,87,694 मामले विभिन्न न्यायालयों में लंबित थे (2024 के आँकड़े, PIBUK; SCC Online)। 22 सितंबर 2026 को देश के सर्वोच्च न्यायालय ने अधिनियम में 2018 के संशोधन को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी (LawBeat)।
यह लेख अधिनियम, अधिनियम के तहत अपराधों और दंडों, संशोधन, अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों, अग्रिम जमानत और अधिनियम के तहत ‘झूठे मामलों’ का विवरण प्रस्तुत करता है।
एससी एसटी एक्ट क्या है: एससी/एसटी अधिनियम के बारे में
अधिनियम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के विरुद्ध अत्याचार करने वालों पर मुकदमा चलाया जाए (जनजातीय कार्य मंत्रालय, अधिनियम का पाठ)। इस संबंध में पहला कानून अस्पृश्यता निषेध अधिनियम, 1955 था (विकिपीडिया)। अस्पृश्यता, वर्तमान में अस्पृश्यता की स्थिति और अन्य संबंधित विषयों के बारे में जानकारी का स्वागत है।
2015 में अधिनियम में विभिन्न संशोधन किए गए, जो 26 जनवरी 2016 से प्रभावी हुए (वजीराम एंड रवि)। अधिनियम के नियम 14 अप्रैल 2016 को प्रकाशित किए गए (विकिपीडिया)। संशोधित अधिनियम में एक विशेष विशिष्ट न्यायालय का भी प्रावधान किया गया (Airacle; Lawyers Club India)।
एससी श्रेणी, एसटी श्रेणी (Airacle; Lawyers Club India)। “अनुसूचित जाति” (एससी) या “अनुसूचित जनजाति” (एसटी) शब्द का प्रयोग सामान्यतः उन व्यक्तियों के लिए किया जाता है जो इन श्रेणियों से संबंधित हैं।
एससी एसटी एक्ट की धाराएँ: एससी/एसटी अधिनियम के महत्वपूर्ण प्रावधान
धारा 3: अधिनियम की धारा 3 में विभिन्न प्रकार के अपराधों का वर्णन किया गया है, जिनमें शामिल हैं
- एससी/एसटी सदस्य को जहरीला पदार्थ जबरन खिलाना।
- एससी/एसटी सदस्य को नग्न अवस्था में घुमाना।
- एससी/एसटी सदस्य पर सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार थोपना।
- एससी/एसटी सदस्य की भूमि में जबरन प्रवेश करना और उस पर कब्जा करना।
- एससी/एसटी सदस्य के घर के आसपास गंदगी या हानिकारक पदार्थ फेंकना या फिंकवाना।
एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3 और अन्य संशोधनों के विवरण के लिए (Airacle; Lawyers Club India) देखें।
एससी एसटी एक्ट में सजा: संक्षिप्त दृष्टिकोण
एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(1) में न्यूनतम 6 महीने और अधिकतम 5 वर्ष के कारावास के साथ जुर्माने का प्रावधान है (जनजातीय कार्य मंत्रालय)। Airacle (2015) में अपील न्यायालय ने माना कि आईपीसी के तहत ऐसे अपराधों के लिए, जिनमें न्यूनतम दंड 10 वर्ष है, न्यायालय आजीवन कारावास की सजा दे सकता है। आग या विस्फोटकों द्वारा एससी/एसटी की संपत्ति को नष्ट करने पर न्यूनतम 6 महीने से 7 वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है (The Law Institute)। यदि संपत्ति सार्वजनिक पूजा का स्थान या निवास है, तो सजा आजीवन कारावास की होगी।
कितने मामलों में सजा हुई
सजा के चरण तक पहुंचने वाले मामलों की संख्या के संबंध में कोई विश्वसनीय आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। एनसीआरबी के आँकड़ों से पता चलता है कि पीओए के तहत मामलों में दोषसिद्धि दर 2020 में 39-40% और 2022 में 32-33% थी। 60% से अधिक मामलों में आरोपी को बरी कर दिया गया (The Week)।
हालांकि, 30 जुलाई 2026 को राज्यसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर के अनुसार, अधिनियम के तहत दोषसिद्धियों की संख्या 2020 में 2,613 से बढ़कर 2022 में 4,876, 2023 में 4,691 और 2024 में 5,192 हो गई। मामलों की लंबितता भी बढ़ी और 2020 में 1,77,379 तथा 2024 में 2,87,694 थी। 2023 में लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर के अनुसार, पीओए, 1989 के तहत कुल 3,07,355 मामले भारत के न्यायालयों में लंबित थे (PIB)।
एससी एसटी एक्ट 2018 संशोधन: मार्च का निर्णय और अगस्त का कानून
मार्च 2018 का निर्णय
मार्च 2018 में सुबाष काशीनाथ महाजन बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जहां प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता या शिकायत दुर्भावनापूर्ण पाई जाती है, वहां न्यायालय अग्रिम जमानत देने से वंचित नहीं है। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि लोक सेवकों को उनके नियुक्ति प्राधिकारी के निर्देश पर और गैर-लोक सेवकों को एसएसपी के निर्देश पर गिरफ्तार किया जाना चाहिए, हालांकि डीएसपी द्वारा प्रारंभिक जांच की जा सकती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रतिशोध का हथियार बनाना नहीं था (Delhi Law Academy)।
मार्च के निर्णय की कई लोगों ने आलोचना की, क्योंकि न्यायालय ने आँकड़ों या सांख्यिकीय साक्ष्यों का विश्लेषण किए बिना बड़ी संख्या में झूठे मामलों के अस्तित्व की पुष्टि करने के लिए बरी किए जाने की उच्च दर पर भरोसा किया (ClearIAS)। निर्णय के विरोध में अप्रैल 2018 में भारत बंद का आह्वान किया गया (LawBeat)।
अगस्त 2018 का संशोधन
अगस्त 2018 में अधिनियम में किए गए संशोधन ने एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच करने के प्रावधान को हटा दिया और पुलिस को न्यायिक नियंत्रण या हस्तक्षेप के बिना गिरफ्तारियां करने की अनुमति दी (LawBeat)।
सर्वोच्च न्यायालय का रुख: 2019 से 2026 तक
1 अक्टूबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने पुनर्विचार में प्रारंभिक जांच करने और गिरफ्तारियों के लिए पूर्व स्वीकृति अनिवार्य करने वाले आदेशों को रद्द कर दिया (Delhi Law Academy; Prathvi Raj Chauhan, Supreme Court)। 10 फरवरी 2020 को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा, न्यायमूर्ति विनीत सरन और न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट की पीठ ने पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ मामले में धारा 18A की वैधता की पुष्टि की (Prathvi Raj Chauhan, IndianKanoon; LawBeat)।
22 सितंबर 2026 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बृजभूषण सैनी बनाम भारत संघ की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी और 2020 के निर्णय को बरकरार रखा। 2020 के निर्णय के विरुद्ध तर्क देते हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि कानून के कठोर प्रावधानों के दुरुपयोग की संभावना है और इससे भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 21 और 22 के तहत गारंटीकृत अधिकार प्रभावित होंगे। पीठ ने कहा कि ऐसे दुरुपयोग के विरुद्ध पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपाय मौजूद हैं (LawBeat)।
एससी एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत: क्या यह संभव है?
अधिनियम की धारा 18 और 18A अग्रिम जमानत पर रोक लगाती हैं। Prathvi Raj Chauhan (2020) मामले में न्यायालय ने कहा कि यदि शिकायत से प्रथम दृष्टया मामला नहीं बनता है, तो यह रोक लागू नहीं होगी। यह भी कहा गया कि प्रक्रिया के दुरुपयोग से बचने के लिए असाधारण परिस्थितियों में न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक हो सकता है (विकिपीडिया)।
2018 के Mahajan मामले में भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए गए थे और सरकारी वकील ने भी कहा था कि पूर्ण रोक तभी होगी जब प्रथम दृष्टया मामला बनता हो (Subhash Kashinath Mahajan, Indian Kanoon)। उपर्युक्त के मद्देनजर, हम निष्कर्ष निकालते हैं कि अग्रिम जमानत पर रोक तभी लागू होगी जब शिकायत से प्रथम दृष्टया मामला बनता हो। हमारा सुझाव है कि इस संबंध में कोई भी कदम उठाने से पहले आप किसी वकील से परामर्श करें।
एससी और एसटी के विरुद्ध अत्याचार के झूठे मामलों के रुझान और आँकड़े
झूठे मामले, गलत तथ्यों पर आधारित मामले और ऐसे मामले जिनमें साक्ष्य पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन कृत्य उचित हो सकता है, वे कुछ ऐसी श्रेणियाँ हैं जिनमें एनसीआरबी अपराध के आँकड़ों को वर्गीकृत करता है (Dataful)। एक प्रस्तुति में, राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी ने बताया कि 2016 में दर्ज कुल 56,299 मामलों में से पुलिस ने 5,347 मामलों को झूठा, 2,150 मामलों को ऐसे मामले माना जिनमें साक्ष्य अपर्याप्त था लेकिन कृत्य उचित था, और 869 मामलों को गलत तथ्यों पर आधारित मामले माना।
2016 में झूठे मामले दर्ज किए गए कुल मामलों का 9.49% थे (National Judicial Academy)। हम 2016 के आँकड़े साझा कर रहे हैं, और एनसीआरबी की रिपोर्टों में अलग-अलग आँकड़े हो सकते हैं।
एक पक्ष कहता है कि दुरुपयोग की चिंता असली है और 2018 के फैसले ने यही उठाया था (Delhi Law Academy; LawBeat)। दूसरा पक्ष कहता है कि बरी होना झूठा होना नहीं है। बरी होने की वजहें जाँच में देरी, गवाहों का मुकर जाना, अदालत में पेश न होना और सबूत जुटाने की कमी हो सकती हैं (The Week), और पीड़ितों या गवाहों को डराना-धमकाना भी (ClearIAS)। 29 अक्टूबर 2021 को Supreme Court ने कहा कि SC/ST पर अत्याचार अतीत की बात नहीं हैं (Wikipedia, Hindustan Times के हवाले से)। उसी खबर के शीर्षक के अनुसार कम दोषसिद्धि की वजह घटिया जाँच बताई गई (Hindustan Times)। हमारी राय इसमें नहीं है। सिर्फ आँकड़ों से किसी एक पक्ष की बात साबित नहीं होती।
अत्याचार के आँकड़े: कितने मामले दर्ज
राज्यसभा में 30 जुलाई 2026 को रखे गए NCRB के आँकड़ों के अनुसार PoA कानून के तहत दर्ज मामले 2020 में 45,995, 2022 में 52,866, 2023 में 53,372 (उच्चतम) और 2024 में 48,669 थे (PIB; SCC Online)। 2023 में 45,439 मामलों में आरोप-पत्र दाखिल हुआ (PIB)। ये आँकड़े SC के खिलाफ दर्ज मामलों के हैं। SC के खिलाफ सभी अपराधों (सिर्फ इस कानून के तहत नहीं) की संख्या 2023 में 57,789 थी (Tribune)।
कानून के नाम पर वायरल दावों (जैसे “बिना जाँच गिरफ्तारी”) की जाँच के लिए फैसले और अधिनियम का मूल पाठ पढ़ना पड़ता है। Ambedkarite Educational Program (AEP) blogging, website बनाना, email marketing, AI tools और Google AI सिखाता है, ताकि पढ़े हुए फैसले का सार अपनी साइट पर स्रोत के साथ रखा जा सके। इसकी फीस एक बार की ₹297 है और access lifetime मिलता है। Free शुरुआत के लिए Movement से जुड़ सकते हो।
निष्कर्ष
एससी एसटी एक्ट क्या है, इसका सीधा जवाब है: 1989 का कानून, जो SC/ST न होने वाले लोगों के उन अपराधों को सज़ा देता है जो SC और ST के सदस्यों के खिलाफ हों। सज़ा 6 महीने से 5 साल (धारा 3(1)) से लेकर उम्रकैद तक है। 2018 में Mahajan फैसले के बाद संसद ने धारा 18A जोड़ी, जिसे Supreme Court ने 2020 में वैध माना और 22 सितंबर 2026 को दोबारा परखने से इनकार किया। अग्रिम जमानत पर रोक है, पर प्रथम दृष्टया मामला न बनने पर नहीं। “झूठे केस” पर बहस में आँकड़े दोनों तरफ़ से इस्तेमाल होते हैं, और अपने-आप में कोई फैसला नहीं देते।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
एससी एसटी एक्ट क्या है?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, जो SC/ST न होने वाले लोगों के उन अपराधों के लिए सज़ा तय करता है जो SC और ST के सदस्यों के खिलाफ हों (Ministry of Tribal Affairs; Wikipedia)।
एससी एसटी एक्ट में सजा क्या है?
धारा 3(1) में 6 महीने से 5 साल की कैद और जुर्माना, और दस साल या ज़्यादा सज़ा वाले IPC अपराधों पर उम्रकैद और जुर्माना (Ministry of Tribal Affairs; Airacle)।
एससी एसटी एक्ट 2018 संशोधन क्या है?
अगस्त 2018 में संसद ने धारा 18A जोड़ी: FIR के लिए प्रारंभिक जाँच नहीं, गिरफ्तारी के लिए पूर्व मंज़ूरी नहीं और अग्रिम जमानत की धारा लागू नहीं (LawBeat)।
क्या एससी एसटी एक्ट में अग्रिम जमानत मिलती है?
सामान्य तौर पर रोक है। Prathvi Raj Chauhan (2020) के अनुसार शिकायत से प्रथम दृष्टया मामला न बनने पर रोक लागू नहीं होती (LawBeat)।
एससी एसटी एक्ट की धाराएँ कौन सी हैं?
धारा 3 (अपराध और सज़ा), 4 (लोकसेवक का कर्तव्य), 14 और 14A (Special Court), 15A (पीड़ित के अधिकार) और 18, 18A (अग्रिम जमानत की रोक) (Ministry of Tribal Affairs; Lawyers Club India)।
SOURCES
- Ministry of Tribal Affairs, अधिनियम का पाठ (PDF): https://tribal.nic.in/actRules/SCSTpoaact1989.pdf
- Wikipedia, SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989: https://en.wikipedia.org/wiki/Scheduled_Caste_and_Scheduled_Tribe_(Prevention_of_Atrocities)_Act,_1989
- Vajiram and Ravi: https://vajiramandravi.com/current-affairs/scheduled-caste-and-scheduled-tribe-prevention-of-atrocities-act-1989/
- Airacle: https://airacle.in/blog/sc-st-act-1989/
- TheLaw.Institute: https://thelaw.institute/indian-penal-code/sc-st-prevention-atrocities-act-punishments/
- Lawyers Club India: https://www.lawyersclubindia.com/articles/sc-st-prevention-of-atrocities-act-1989-important-sections-and-judgments-14905.asp
- Subhash Kashinath Mahajan, IndianKanoon: https://indiankanoon.org/doc/108728085/
- Prathvi Raj Chauhan, IndianKanoon: https://indiankanoon.org/doc/31336209/
- Prathvi Raj Chauhan, Supreme Court (PDF): https://api.sci.gov.in/supremecourt/2018/31176/31176_2018_3_1501_20551_Judgement_10-Feb-2020.pdf
- LawBeat (22 सितंबर 2026): https://lawbeat.in/top-stories/supreme-court-rejects-challenge-to-2018-amendment-restoring-stringent-scst-act-provisions-1634231
- Delhi Law Academy (2018 का फैसला): https://www.delhilawacademy.com/dr-subhash-kashinath-mahajan-v-state-of-maharashtra-2018/
- Delhi Law Academy (SC/ST Act Explained): https://www-delhilawacademy-com.translate.goog/sc-st-act-explained/?_x_tr_sl=en&_x_tr_tl=hi&_x_tr_hl=hi&_x_tr_pto=tc
- ClearIAS: https://www.clearias.com/sc-st-prevention-of-atrocities-act/
- PIB (राज्यसभा, 30 जुलाई 2026): https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2291974®=48&lang=2
- SCC Online: https://www.scconline.com/blog/post/2026/07/31/sc-st-atrocities-act-cases-convictions-ncrb-data-2024/
- PIB (लोकसभा): https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2197828®=3&lang=1
- The Week: https://www.theweek.in/news/india/2025/12/08/bjp-government-hails-success-but-ncrb-data-shows-a-troubling-reality-for-sc-st-act-cases.html
- National Judicial Academy, False Cases under SC/ST: https://nja.gov.in/Concluded_Programmes/2017-18/P-1096_PPTs/2.False%20Cases%20under%20SC-ST.pdf
- Dataful, NCRB dataset: https://dataful.in/datasets/23279/
- Hindustan Times (2021): https://www.hindustantimes.com/india-news/fewer-convictions-in-sc-st-cases-due-to-shoddy-investigations-supreme-court-101635531834261.html
- Tribune (NCRB 2023): https://www.tribuneindia.com/news/punjab/crime-against-scs-sts-up-in-bjp-ruled-states-says-cheema/amp

